History of Ramadan | रमजान का इतिहास – रमजान क्यों महत्पूर्ण है |

       

  Ramdan (रमजान) अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Ramadan(रमजान) के बारे 6 सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले  अधिकतर सवाल. 
1. History of Ramadan  (रमजान का इतिहास)
2.  Ramadan meaning (रमजान का अर्थ ) 
3.  Why is Ramadan important (रमजान क्यों महत्पूर्ण है) 
4. Ramada Fasting (रमजान उपवास- का रोजा) 5. Ramadan rules (रमजान के नियम)
6. Ramadan fact (रमजान के तथ्य)
आज हम इन्हीं 6 टॉपिक पर फोकस डालेंगे. 


1. History of Ramadan (रमजान का इतिहास)

सबसे पहले History of Ramadan (रमजान का इतिहास) किया हैं 
Ramadan(रमजान) मुलसमानों का मानना हैं कि Ramadan(रमजान) एक पवित्र महीना  हैं इस Ramadan(रमजान) के महीने मे ही PROPHET MUHAMMAD (S.A.W) पर कुरान शरीफ नाजील हुआ या खुलासा हुआ, और मुसलमानों का ये भी मानना हैं  
 कुरआन पाक भी दुनिया में पूरा  इसी महीने में उतारा गया। तेहीस  साल में हालातों के हिसाब से कुरआन को थोड़ा-थोड़ा नाजिल किया गया। क़ुरान इंसानो के लिए. के. एक. सीधा रस्ता हैं जिसमें. सही और. गलत के बारे. मे. बतायाा गया है। Ramadan(रमजान) के महीने मे ही और भी आसमानी पवित्र किताबों का खुलासा हुआ हैं हजरत  दाऊद को जबूर (कुरआन की तरह ही आसमानी किताब) Ramadan(रमजान)  में ही मिली और हजरत मूसा (A.S)को तौरेतRamadan(रमजान)  को अता की गई। हजरत ईसा (A.S)को इंजील 12 या 13 Ramadan(रमजान)  को मिली। अल्लाह को Ramadan(रमजान)  का महीना कितना पसंद है, यह मिसालें पढ़ने के बाद आपको पता चल गया होगा।

2. Ramadan meaning (रमजान का अर्थ )


रोजा को अरबी मे सोम कह्ते है इसका मतलब होता है रुकना।  रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से परहेज़ करना। रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
रमजान का महीना कभी २९ दिन का तो कभी ३० दिन का होता है। इस महीने में उपवास रखते हैं। उपवास को अरबी में “सौम”, इसी लिये इस मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहते हैं। फ़ारसी में उपवास को रोज़ा कहते हैं। भारत के मुसलिम समुदाय पर फ़ारसी प्रभाव ज़्यादा होने के कारण उपवास को फ़ारसी शब्द ही उपयोग किया जाता है।
Roza के दिन सूरज निकलने से पहले कुछ खा-लेते हैं जिसे सहरी कहते हैं। और ना ही दिन भर  कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूरज के डूबने के बाद रोज़ा खोला जाता हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं।

3.  Why is Ramadan important (रमजान क्यों महत्पूर्ण है) 

मुसलमानो का मानना है कि आसमान स्वर्ग से आए  जीबराईल (A.S) फरिश्ते ने Prophet Muhammad (S.A.W) को अल्लाह का संदेश सुनाया और
 जो संदेश सुनाते थे उसे आयात कह्ते हैं उन्हीं संदेश यानी आयातों ने कुरान का रूप ले लिया. 
इस्लाम धर्म मै अच्छा इंसान बनने के लिए पहले 
मुस्लमान बनना जरूरी है और मुस्लमान बनने के लिए 5 बुनियादी(पिलर) है और ईन पांचो बुनियादी(पिलर) . अम्ल करना बहुत  जरूरी है जिनमे पाँच बुनियादी(पिलर) बाते ये है.
1. IMAAN (ईमान)     2. NAMAZ (नमाज)       
 3. ROZA(रोजा)         4.   HAJ (हज)
5. Jakat (जकात)।

इस्लाम के ये पाँच बुनियादी(पिलर) बातें इंसानो से मुहब्बत, हमदर्दी, और मदद करना सिखाता हैं
रोजा को अरबी मे सोम कह्ते है इसका मतलब होता है रुकना।  रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से दूर यानी पहरेज करना। रोज़े में दिन भर कुछ भी नहीं खाया जाता और नहीं पिया जाता यानी भूखा व प्यासा ही रहा जाता है। इसी तरह अगर किसी जगह लोग किसी की बुराई और गीबत कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे जगह पर खड़ा होना मना है।
Important Ramadan(रमजान) का असली मकसद
रोजे रखने का मकसद अल्लाह में यकीन  पेदा करना  और इबादत का शौक पैदा करना है। साथ ही सभी तरह के  कबीरा और सगीरा  गुनाहों और गलत कामों से तौबा की जाती है। इसके अलावा, नेकी का काम करने मैं उत्सह पेदा करना, लोगों से हमदर्दी रखना और खुद पर कंट्रोल रखने का जज्बा पैदा करना भी इसका हिस्सा है।

सन्  दो हिजरी में ही जकात (चैरिटी) को भी जरूरी बताया गया है।  अगर किसी के पास साल भर उसकी जरूरत से अलग साढ़े बावन तोला चांदी या उसके बराबर का कैश या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात  के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाता है। और , ईद के दिन से ही फितरा (एक तरह का दान है) हर मुस्लिम को अदा करना wazib होता है। इसमें दो किलो पतालीस ग्राम गेहूं की कीमत तक की रकम गरीबों में दान यानी दिया जाता है।

• Prophet Muhammad (S.A.W)  ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे Ramadan(रमजान)  आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।

4. Ramada Fasting (रमजान उपवास- का रोजा) 


जेसे की मेने पहले ऊपर वाले हेडिंग मे बटाया था कि इस्लाम के पाँच बुनियादी(पिलर) हैं एक अच्छा मुस्लमान बनने के लिये  IN पर अम्ल करना जरूरी है 
1 .  IMAAN (ईमान)     2. NAMAZ (नमाज)        3. ROZA(रोजा)         4.   HAJ (हज)
5. Jakat (जकात)
ऊपर दिए पाँच बुनियादी(पिलर) में से 3 नंबर पर आता है Roza रखना फर्ज हैं जब मुसलमान रोज़ा रखता है, उसके हृदय में भूखे इंसान के लिए हमदर्दी पैदा होती है।रमज़ान में सवाब के कामों का सबाव सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है।

रोजा यानी झूठ बोलना, झगड़ा करना ,किसी की बुराई करना, रिश्वत लेना और तमाम गलत कामों से बचने के लिए प्रेरणा देता है। ऐसा करना पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे।
कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज़ किया है, ताकि तुम अल्लाह से डरने वाले बनो और अल्लाह से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर नरम दिल और दूसरे को नुकसान ना पहुचे

5. Ramadan rules (रमजान के नियम) 

• महीने भर के रोज़े (उपवास) रखना
• रात में तरावीह की नमाज़  अदा पढना
• क़ुरान तिलावत करना
• यानी अपने शहर या बस्ती वालो के दुुुआ  करना  और किसी से ज्यादा ना बोलना 
• ज़कात देना
महीने भर के रोज़े (उपवास) रखना;
Ramadan(रमजान)   का महीना कभी 29 दिन का तो कभी 30दिन का होता है। इस महीने में Roza रखते हैं। 
Suhoor
Roza के दिन सूरज निकलने से पहले कुछ खा-लेते हैं जिसे सहरी कहते हैं। और ना ही दिन भर  कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूरज के डूबने के बाद रोज़ा खोला जाता हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं।

RAMDAN के रात में तरावीह की नमाज़ अदा करना 
मुस्लमान के लिए  RAMDAN मैं तरावीह की NAMAZ PHADNA सुन्नत हैं इसमे ईशा. के NAMAZ के बाद तरावीह की.namaz अदा  कि जाती हैं
Aaise ही RAMADAN (रमजान) KAREEM कुरान  की तिला-वत की जाती. 
एतेकाफ़ बैठना, यानी अपने शहर या बस्ती वालो के दुुुआ  करना  और किसी से ज्यादा ना बोलना 

ज़कात देना 
सन्  दो हिजरी में ही जकात (चैरिटी) को भी जरूरी बताया गया है।  अगर किसी के पास साल भर उसकी जरूरत से अलग साढ़े बावन तोला चांदी या उसके बराबर का कैश या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात  के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाता है। और , ईद के दिन से ही फितरा (एक तरह का दान है) हर मुस्लिम को अदा करना wazib होता है। इसमें दो किलो पतालीस ग्राम गेहूं की कीमत तक की रकम गरीबों में दान यानी दिया जाता है।

6. Ramadan fact (रमजान के तथ्य)

• Ramadan रमजान को नेकियों या महीने कहा गया है। Ramadan को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत  ज्यादा  तवोजो देता है।  वअल्लाह को. मनाने या राजी करने लिये रोजा के साथ, कुुुरआन की तलवात करते है.
• यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। अगर कोई शख्स इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराता है तो इसके सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। PROPHET MUHAMMAD (S. A. W) से आपके किसी सहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो तो क्या करें। तो PROPHET MUHAMMAD (S. A. W)  ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए।

• यह महीना गरीब और लाचार लोगों की मदद करने का महीना है।

 Ramadan के तअल्लुक से हमें बुहत सारी हदीसें मिलती हैं और हम ऐसी हदीसे पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्याा हम इस पर अम्ल भी कर ते हैं हम अपने दिल पर हाथ  रखकर अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग जो मुहताज और लाचार है उन की hum मदद करते हैं जैसी हमे करनी चाहिए? सिर्फ सदका और zakat देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।

• जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। अल्लाह की राह में खर्च करना अफज़ल है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दीगयी है। दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है।
• ज़कात, सदक़ा, फित्रा, खैर खैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।
• अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज़्यादा करदेता है।
• मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे Ramadan आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।
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